क्या ‘फॉरवर्ड फैक्टर’ तय करेगा राज्य की सत्ता का समीकरण?

बिहार विधानसभा चुनाव 2025 की तारीखों का ऐलान हो चुका है। राज्य में मतदान 6 नवंबर से दो चरणों में संपन्न होगा। जैसे-जैसे चुनाव नज़दीक आ रहा है, बिहार की जटिल जातीय राजनीति फिर से सुर्खियों में है।

महागठबंधन, जिसकी अगुवाई तेजस्वी यादव के नेतृत्व वाले RJD और कांग्रेस कर रहे हैं, अपनी मुस्लिम-यादव वोट बैंक को बनाए रखने की रणनीति पर जोर दे रहा है। इस गठबंधन का मानना है कि इसका समर्थन अभी भी पार्टी की सबसे मजबूत नींव है।

वहीं दूसरी ओर, बीजेपी अपने पारंपरिक फॉरवर्ड कास्ट वोटर यानी राजपूत, भूमिहार, कायस्थ और ब्राह्मण वर्ग को ध्यान में रखते हुए रणनीति बदल रही है। इस दिशा में पार्टी ने “सांगा यात्रा” शुरू की, जिसका उद्देश्य इन अग्रगामी जातियों को जोड़ना और उन्हें राजनीतिक रूप से महत्व देना है।
सांगा यात्रा का नाम राजपूत योद्धा राजा राणा सांगा से प्रेरित है और यह दिखाता है कि पार्टी इन समुदायों को सियासी बहस में फिर से मुख्यधारा में लाने की कोशिश कर रही है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस बार बिहार का सत्ता समीकरण पारंपरिक वोट बैंक और उभरते सामाजिक मांगों के बीच संतुलन पर तय होगा। राजनीतिक दल अंतिम क्षणों में अपनी रणनीतियों को और निखार रहे हैं, ताकि जातीय समीकरण और वोटिंग प्रवृत्तियों के अनुरूप चुनावी जीत सुनिश्चित की जा सके।

जैसे-जैसे मतदान का दिन नज़दीक आता है, यह देखना रोचक होगा कि फॉरवर्ड फैक्टर किस हद तक बिहार की सियासत और सत्ता के समीकरण को प्रभावित करता है।

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