एजुकेशन डेस्क: लंबे समय तक अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा और ऑस्ट्रेलिया भारतीय छात्रों के लिए उच्च शिक्षा के सबसे पसंदीदा विकल्प रहे। लेकिन वर्ष 2026 में विदेश में पढ़ाई को लेकर छात्रों और अभिभावकों की सोच तेजी से बदल रही है। अब केवल प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय नहीं, बल्कि पढ़ाई की लागत, वीजा की संभावनाएं, नौकरी के अवसर और निवेश पर मिलने वाला प्रतिफल (Return on Investment-ROI) भी निर्णय का अहम आधार बन गया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि वैश्विक शिक्षा व्यवस्था खत्म नहीं हो रही, बल्कि नई परिस्थितियों के अनुसार खुद को पुनर्गठित कर रही है।
अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा और ऑस्ट्रेलिया में बढ़ीं चुनौतियां
विदेश में पढ़ाई के पारंपरिक गंतव्यों में हाल के वर्षों में कई नई चुनौतियां सामने आई हैं।
राज्यसभा में अप्रैल 2026 में दी गई जानकारी के अनुसार, अमेरिका के विश्वविद्यालयों में भारतीय छात्रों के नामांकन में 6.9 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई, जिसकी प्रमुख वजह बढ़ी हुई जांच प्रक्रिया बताई गई।
वहीं, वर्ष 2025 में कनाडा ने भारतीय छात्रों के करीब 80 प्रतिशत वीजा आवेदन अस्वीकार कर दिए। दूसरी ओर ऑस्ट्रेलिया ने 2026 की शुरुआत में भारत को छात्र वीजा के लिए उच्च जोखिम (High Risk) श्रेणी में शामिल किया।
ब्रिटेन ने भी घोषणा की है कि जनवरी 2027 से मास्टर डिग्री पूरी करने वाले अंतरराष्ट्रीय छात्रों के लिए Graduate Route Visa की अवधि घटाकर 18 महीने कर दी जाएगी, जिससे पढ़ाई के बाद नौकरी तलाशने का समय कम हो जाएगा।
महंगी होती पढ़ाई और बढ़ती आर्थिक चुनौती
विदेश में शिक्षा की लागत भी लगातार बढ़ रही है। केवल विश्वविद्यालयों की फीस ही नहीं बढ़ी, बल्कि भारतीय रुपये की कमजोरी ने भी खर्च को काफी बढ़ा दिया है।
पिछले एक वर्ष में रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले लगभग 9 प्रतिशत और ब्रिटिश पाउंड के मुकाबले करीब 21 प्रतिशत कमजोर हुआ है। इसका सीधा असर भारतीय छात्रों की कुल पढ़ाई की लागत पर पड़ा है।
अनुमान है कि वर्ष 2026 में अमेरिका के शीर्ष विश्वविद्यालयों में पढ़ाई का कुल खर्च 68 से 75 लाख रुपये तक पहुंच सकता है। जबकि अधिकांश भारतीय परिवारों का शिक्षा बजट 20 लाख रुपये से कम रहता है। ऐसे में छात्र अब यह सवाल पूछ रहे हैं कि क्या इतनी बड़ी लागत भविष्य में उचित लाभ दे पाएगी।
अब सवाल ‘कहां पढ़ें’ नहीं, बल्कि ‘क्यों पढ़ें’ का
शिक्षा विशेषज्ञों के अनुसार भारतीय छात्रों की सोच में सबसे बड़ा बदलाव यही है कि अब चर्चा केवल विदेश जाने की नहीं, बल्कि उसके उद्देश्य की हो रही है।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 के बाद भारतीय संस्थानों में अंतरराष्ट्रीय सहयोग, शोध आदान-प्रदान और वैश्विक साझेदारी के अवसर बढ़े हैं। कई विदेशी विश्वविद्यालय भी भारत में अपने परिसर स्थापित कर रहे हैं।
ऐसे में यदि किसी भारतीय संस्थान या संयुक्त डिग्री कार्यक्रम के माध्यम से कम लागत में वैश्विक अनुभव प्राप्त हो सकता है, तो विदेश जाने की आवश्यकता पहले जैसी नहीं रह गई है।
नए देशों और नए कोर्स की ओर बढ़ रहा रुझान
भारतीय छात्र अब केवल अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा और ऑस्ट्रेलिया तक सीमित नहीं हैं। उनकी रुचि अब जर्मनी, फ्रांस, आयरलैंड, सिंगापुर, जापान और मलेशिया जैसे देशों की ओर भी बढ़ रही है।
सिंगापुर कम खर्च, भौगोलिक निकटता और बेहतर पोस्ट-स्टडी वर्क अवसरों के कारण तेजी से लोकप्रिय हो रहा है। रिपोर्ट के अनुसार 68 प्रतिशत छात्र अब पढ़ाई के लिए कम लागत को प्रमुख प्राथमिकता मानते हैं।
कोर्स चयन में भी बदलाव देखा जा रहा है। जहां आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और डेटा साइंस की लोकप्रियता बनी हुई है, वहीं साइबर सिक्योरिटी में रुचि एक वर्ष में 147 प्रतिशत बढ़ी है। इसके अलावा प्रोजेक्ट मैनेजमेंट कोर्सों की मांग में भी उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है।
टियर-2 शहरों से भी बढ़ रहा विदेश शिक्षा का रुझान
रिपोर्ट के अनुसार अब छोटे शहरों के छात्र भी अधिक जागरूक होकर विदेश शिक्षा के विकल्प तलाश रहे हैं। उदाहरण के तौर पर कोच्चि से विदेश में पढ़ाई के लिए किए गए आवेदनों में 762 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है।
विशेषज्ञों का कहना है कि आज के छात्र विदेश शिक्षा को केवल सपना नहीं, बल्कि अपने भविष्य में किया जाने वाला निवेश मानकर निर्णय ले रहे हैं। वे वीजा मिलने की संभावना, पढ़ाई की लागत, नौकरी के अवसर और दीर्घकालिक लाभ जैसे सभी पहलुओं का मूल्यांकन कर रहे हैं।
डिजिटल एजुकेशन प्लेटफॉर्म की भूमिका होगी अहम
बदलते दौर में केवल एडमिशन और वीजा काउंसलिंग पर्याप्त नहीं मानी जा रही है। छात्रों को अब ऐसे डिजिटल प्लेटफॉर्म की आवश्यकता है, जहां उन्हें विभिन्न देशों की वीजा सफलता दर, मुद्रा विनिमय के आधार पर वास्तविक खर्च, रोजगार संभावनाएं और अलग-अलग शिक्षा विकल्पों की तुलना एक ही स्थान पर मिल सके।
विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले वर्षों में विदेश शिक्षा का फैसला केवल देश देखकर नहीं, बल्कि लागत, करियर और निवेश पर मिलने वाले प्रतिफल के आधार पर लिया जाएगा।

